तुलसीदास
~~~~~~
बनारस के अस्सी घाट पर
बैठे हैं उदास
गोस्वामी तुलसीदास
देखते रहते हैं चुपचाप
गंगा में डुबकी लगाने वालों की भीड़ को
उस भीड़ में कुछ ऐसे भी हैं शामिल
जो स्नान के बाद
लगाकर माथे पर तिलक
करते हैं मानस की बातें
लोगों को बताते हैं
अपना आचरण और संस्कार
ताकि चलता रहे
उनके सियासत का बाजार
ऐसे हालात में तुलसीदास
बंद कर लेते हैं अपनी आँखें
और कहते हैं श्रीराम से--
मैंने जो कुछ भी लिखा, भक्ति -भाव से लिखा
जो कल्याणकारी है मानव मात्र के लिए
पर अब जाति, धर्म और लिंग का
पहनकर चश्मा
कुछ लोग पढ़ रहे हैं मानस
और बाँट रहे हैं आपको
अब मैं कोई कथा न लिख सकूँगा
सुनकर तुलसीदास की बातें
कहते हैं श्रीराम मुस्कुराकर--
तुम्हारे मानस के सहारे ही
मिलती है ऊर्जा
साधु पुरुषों को
परिस्थितियां जैसी भी हो
तुम लिखते रहना मेरे संदेशों को
ताकि बची रहे मनुष्यता
जब असह्य हो जाए जीना
तब आ जाना मेरे पास
मैं जब भी आऊँगा धरती पर
तुम्हें भी लाऊँगा अपने साथ ।
--- वेद प्रकाश तिवारी
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बनारस के अस्सी घाट पर
बैठे हैं उदास
गोस्वामी तुलसीदास
देखते रहते हैं चुपचाप
गंगा में डुबकी लगाने वालों की भीड़ को
उस भीड़ में कुछ ऐसे भी हैं शामिल
जो स्नान के बाद
लगाकर माथे पर तिलक
करते हैं मानस की बातें
लोगों को बताते हैं
अपना आचरण और संस्कार
ताकि चलता रहे
उनके सियासत का बाजार
ऐसे हालात में तुलसीदास
बंद कर लेते हैं अपनी आँखें
और कहते हैं श्रीराम से--
मैंने जो कुछ भी लिखा, भक्ति -भाव से लिखा
जो कल्याणकारी है मानव मात्र के लिए
पर अब जाति, धर्म और लिंग का
पहनकर चश्मा
कुछ लोग पढ़ रहे हैं मानस
और बाँट रहे हैं आपको
अब मैं कोई कथा न लिख सकूँगा
सुनकर तुलसीदास की बातें
कहते हैं श्रीराम मुस्कुराकर--
तुम्हारे मानस के सहारे ही
मिलती है ऊर्जा
साधु पुरुषों को
परिस्थितियां जैसी भी हो
तुम लिखते रहना मेरे संदेशों को
ताकि बची रहे मनुष्यता
जब असह्य हो जाए जीना
तब आ जाना मेरे पास
मैं जब भी आऊँगा धरती पर
तुम्हें भी लाऊँगा अपने साथ ।
--- वेद प्रकाश तिवारी
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