Thursday, March 18, 2021

बंगरा बाजार

हल्दी का कटोरा - बंगरा बाजार
--------------------------------------
✍ वेद प्रकाश तिवारी
देश में जितने भी शहर हैं उनके नाम के पीछे कोई ना कोई ऐतिहासिक तथ्य छुपा हुआ है । उसी प्रकार कुछ गांव और कस्बे भी हैं जिनकी अपनी अलग पहचान है । देवरिया जिले के भाटपार रानी तहसील से सटे पूर्व और उत्तर के कोने पर लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है बंगरा बाजार, जो हल्दिया बंगरा के नाम से प्रसिद्ध है ।  
सत्तर और अस्सी के दशक में देवरिया जिले में दो ही मुख्य बाजार हुआ करता था एक बरहज और दूसरा हल्दिया बंगरा । बंगरा बाजार हल्दी के उत्पादन में अपनी प्रसिद्धि लिए हुए था । यहां के काश्तकारों की मुख्य खेती हल्दी थी । 
बंगरा बाजार के आसपास के कई गांव-- बखरी ,जासपार कुबेरुआ, चुपवां, करौदा, करौदा, खामपार परसिया,ज़िरवानिया, भठवां तिवारी उधर सीमावर्ती गांवों में भवानी छापर , परगसहा ,परसौनी आनंदघन लक्ष्मण चक, बलिवन  इत्यादि गांवों में हल्दी की खेती बहुतायत होती थी । जासपार के एनूल आलम बताते थे - जिस दिन बाजार लगता था उसके एक दिन पहले यहां दूर-दूर से व्यापारी ट्रक लेकर आते थे और हल्दी लाद कर ले जाते थे। परसौनी आनंदघन गांव के रामधनी भगत कहते थे कि बाजार के रोज शाम को बाजार समाप्ति के बाद इतनी हल्दी गिरी हुई रहती थी जिसे गरीब  चुनकर पुनः बाजार में बेच देते थे जिससे उनका जीवन यापन होता था । गर्मी के दिनों में बाजार सुबह आठ बजे से शाम सात बजे तक लगता था । बैलगाड़ी पर लाद कर के बिसियों बोरी हल्दी काश्तकार लाते थे । माड़ीपुर गांव के एक बुजुर्ग बताते हैं कि बाजार में इतना शोर होता था जिसकी भुनभुनाहन दो किलोमीटर दूर से ही सुनी जा सकती थी ।

आगे चलकर कुछ काश्तकारों के मन में यह प्रश्न जगा कि क्यों ना बंगरा बाजार में एक हल्दी का कारखाना लगाया जाए ताकि पिसी हुई हल्दी देश के कोने कोने में जाए और हम लोगों को उसका लाभ मिले  । इसके लिए जनता के प्रतिनिधियों से कुछ संभ्रांत काश्तकारों ने संपर्क किया । मिश्रौली गांव के जनार्दन सिंह बताते हैं कि करौदा मठ में इसके लिए वहां के महंत के द्वारा जमीन भी उपलब्ध कराई गई थी परंतु जनप्रतिनिधियों ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई और हल्दी भी राजनीति का एक हिस्सा बन गई । 
कुछ अंतराल के बाद प्रतापपुर शुगर फैक्ट्री गन्ने की पेराई बहुतायत मात्रा में करने लगी।  वहां लोगों को नगद पैसा मिलने लगा । किसान धीरे-धीरे गन्ना बोने के प्रति आकर्षित होने लगे ,क्योंकि गन्ने की खेती, हल्दी की खेती से आसान  होती है । हल्दी को बोना उसे उबालना उसका सोंठ बनाना इसमें मेहनत ज्यादा लगता है और समय भी । इसलिए किसान गन्ना उत्पादन करने लगे और उन्हें नगद पैसा मिलने लगा ।  वैश्वीकरण के दौर में धीरे- धीरे हर चट्टी ,चौराहे पर बाजार खुल गए और बाजार में जरूरत की हर चीजें उपलब्ध होने लगीं। इसलिए यहां के काश्तकार हल्दी बोने के प्रति उदासीन हो गए और आज हल्दी टोकरी भर ही बाजार में देखने को मिलती है । 

बंगरा बाजार, भाटपार रानी विधानसभा का हृदय कहा जाता है । बंगरा बाजार  स्वतंत्रता सेनानियों की भूमि रहा है । छठियांव गांव के रहने वाले भागवत भगत ने  स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगाई  । वे अपने हाथों में  खजरी रखते थे और गाया करते थे , देशवा हो गइले गुलाम जाग- जाग ए भैया ।वे महात्मा गांधी के विचारों से बहुत प्रभावित थे । आजादी के अनेक वर्षों बाद  सन 2004 में 4 जनवरी को  बंगरा बाजार के चौराहे पर स्वतंत्रता सेनानी भागवत भगत जी की प्रतिमा दिवंगत सांसद हरि केवल प्रसाद जी के द्वारा चौराहे पर लगाई गई जिसका अनावरण  तत्कालीन मुख्यमंत्री  श्री मुलायम सिंह यादव  ने किया। कुछ अंतराल के बाद भागवत भगत जी की प्रतिमा, चबूतरा,,घेर व उसकी दीवारों का जीर्णोद्धार युवा नेता अश्वनी कुमार सिंह जी के द्वारा किया गया । 
भागवत भगत खजरी वाले की याद में 4 जनवरी को प्रत्येक वर्ष एक किसान मेले का आयोजन किया जाता है, विगत 2 वर्षों में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्य जी के द्वारा मेले का उद्घाटन किया। उनके आगमन से बंगरा बाजार और उसके आसपास के क्षेत्रों को कई परियोजनाओं का लाभ मिला । मेले में कृषि संबंधी उपकरण, खाद, बीज, नर्सरी आदि की प्रदर्शनी लगाई जाती है । किसान अपनी जरूरत की चीजें खरीदते हैं परंतु हरदिया बंगरा में हल्दी की चर्चा तक नहीं होती है। कभी हल्दी का कटोरा कहा जाने वाला बंगरा बाजार आज हल्दी विहीन है आज बंगरा बाजार में शाक, सब्जी, मीट ,मछली और दही आदि बिकता है । दूर दराज के लोग जिन्होंने कभी बंगरा बाजार से हल्दी खरीदा था वे लोग जब कभी बंगरा बाजार में आते हैं तो चर्चा करते हैं एक समय था  जब  हम लोग  हल्दी खरीदने के लिए एक दिन पहले  शाम को  अपने घर से  खाने की सामग्री लेकर चलते थे  रात भर ठहरते थे  और सुबह हल्दी खरीद कर घर ले जाते थे । आज बाजार को देखकर ऐसा लगता है  कि जैसे यहां कभी हल्दी बिकती ही नहीं थी । आज बंगरा बाजार में भले ही हल्दी ना दिखाई देती हो पर आज भी इसकी पहचान  हल्दिया बंगरा से ही होती है ।
बंगरा बाजार , भिन्गारी बाजार, भवानी छापर बाजार , बिहार का मैरवा कस्बा आदि से सीधे सड़क  मार्ग से जुड़ा हुआ है । बंगरा बाजार के 5 किलोमीटर के दायरे में चार से पांच इंटर कॉलेज हैं । स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई हेतु   कई महाविद्यालय भी उपलब्ध हैं। तथा बच्चों के प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी हेतु कोचिंग संस्थाएं भी उपलब्ध हैं। नन्हे बच्चों के लिए पब्लिक स्कूल बाजार के आसपास के सभी छुट्टी चौराहे पर खुले हुए हैं। यहां से जिला मुख्यालय के लिए सीधी बस सेवा भी उपलब्ध है । बंगरा बाजार एक बड़ा व्यवसाय केंद्र है । यहां एक सेंट्रल बैंक स्थापित  है ।  बाजार में नर्सिंग होम भी है  जहां शैल्य चिकित्सा के द्वारा रोगियों का इलाज किया जाता है । यहां एलोपैथिक, आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक डॉक्टर अपनी सेवाएं देते हैं । सड़कों का चौड़ीकरण होने के बाद आवागमन का साधन बढ़ गया है । बंगरा बाजार बिहार के सिवान और गोपालगंज जिले से उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले से भी सीधे सड़क मार्ग से जुड़ा है जहां बहुत कम समय में जाया जा सकता है । 

बंगरा बाजार के करीब, लकड़ियहवा बाबा जो एक सिद्ध संत थे , उनकी तपोस्थली है । ग्राम करौदा में संत कबीर के अनुयायियों का एक बड़ा मठ है  , जो काफी प्रसिद्ध है । जहां प्रतिवर्ष एक बड़े आयोजन के अंतर्गत संत समागम का कार्यक्रम होता है  और एक विशाल भंडारे का भी आयोजन होता है । बंगरा बाजार से सटे चुप्पा शाह बाबा की मजार है जो मुस्लिम भाई बहनों  के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है जहां दूर-दूर से लोग अपनी मन्नतों को पूरा करने आते हैं ।
 
मेरा आलेख उन सभी युवा साथियों और बच्चों के लिए है जो बंगरा बाजार की धरती को ठीक से नहीं जानते । मैंने इस आलेख में अधिक से अधिक जानकारी आपको देने की कोशिश की है । अपनी राय कृपया कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं । मैं  बंगरा बाजार की क्रांतिकारी मिट्टी को  नमन करता हूं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  स्वर्गीय भागवत भगत को अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं । 
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।

Friday, April 10, 2020

खुद से प्रेम

खुद से प्रेम करना वैसा ही है , जैसा फूलों का खिलना

********************************************

भावनाओं में, रिश्तो में जिनसे आप प्यार पाते हैं ,वे लोग खुद से प्यार करने वाले होते हैं । यदि आप स्वयं से प्यार नहीं करते हैं, तो आप दूसरों से प्यार नहीं कर सकते ।

खुद से प्यार करना  ठीक वैसा ही है जैसे फूलों का खिलना । स्वयं को प्यार करना अपने को ऊर्जा से भरना होता है जो आपके भीतर बैठे हताशा , निराशा और आत्मग्लानि को बाहर निकाल कर आपके भीतर सकारात्मक सोच पैदा करता है । जो आपको  स्वावलंबी ,आत्मसम्मानी बनाता है । जिससे आप स्वयं यह तय कर पाते हैं  कि आपको क्या करना है । यह आत्मविश्वास आपको हर दिन कुछ नया करने को प्रेरित करेगा ।  आप शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहेंगे और पूरे आनंद के साथ हर कार्य को पूरा करेंगे ।  आप जैसे भी हैं, उसी रूप में खुद को स्वीकारें।  आप अपनी तुलना किसी से न करें। आप दूसरों की नकल करने की बजाय अपनी एक अलग पहचान बनाएं । आप अपने जानने वालों को कभी खुद को आपने सुप्रभात बोला है ! ऐसा तो कभी नहीं हुआ होगा। थके हुए मन से दिन की शुरुआत करने का मतलब अपनी ऊर्जा को कम करना है। ऐसे में कुछ नया करने के बारे में कैसे सोच सकते हैं ? तो खुद को उर्जावान इस तरह करें कि सुबह जब आईना देखें तो चेहरे पर मुस्कान लेकर अपने लिए भी सुप्रभात बोलें, मानो आज आपका दिन सबसे अच्छा है। फिर चाहे जितनी भी मानसिक या शारीरिक परेशानियां आएं आदमी घबरायेगा नहीं । वह कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपना धैर्य नहीं खोएगा।

किसी ने बहुत सुंदर बात कही है--

" तूफानो के काफ़िले आएंगे गुजर जाएंगे
   कोशिश होगी तुम बुझ जाओ,चुभेंगी हवायें
   विश्वास के बल पर तय हो जीवन का सफर
   दीप तुम जलते रहना यूही निरंतर

  यहाँ अटल बिहारी वाजपेयी जी की ये पंक्तियाँ
  जीवन को दिशा देती हैं--

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ  ।
जिसकी प्रवृत्ति छल, कपट और हिंसा की है वे इस बात को गहराई से नहीं समझ पायेंगे। मात्र आदमी के रूप में पैदा होने से कोई आदमी नहीं बन पाता, क्योंकि संपूर्ण जगत का सार प्रेम है और प्रेम शाश्वत है पर आदमी अपनी कामना और तृष्णा के पीछे इस तरह पागल है कि जो चीजें अमृत हैं उसे छोड़ देता है और काम, क्रोध ,लोभ, मोह ,अहंकार आदि जो जहर है उसे पीता रहता है और अपने आसपास दुखों का एक घेरा बना लेता है ।

 इसी संदर्भ में किसी ने कहा है--

 'क्या करेगा प्यार वो इंसान से, क्या करेगा प्यार वो भगवान से, जन्म लेकर गोद में इन्सान के, कर न पाया प्यार वो इंसान से ।

यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि खुद को प्रेम करने का मतलब यह कतई नहीं है कि आप सिर्फ अपने हित की बात सोचें । यहां तो बात खुद को जगाने की है। यह स्वयं के मनोबल को बढ़ाने का एक बेहतर रास्ता है। अगर आप दुनिया को कुछ देना या समझाना चाहते हैं चाहते हैं कि तो पहले खुद को प्यार कीजिये।

 रामधारी सिंह दिनकर भी कहते हैं--
" दीप सदैव आग को धारण किए रहता है। इस कारण से वह     उसके  दुख को बहुत अच्छी तरह से जानता है। इस सबके बाद भी वह दयाभाव से युक्त होकर स्वयं जलता है और दूसरों को   प्रकाश देता है। वह सदा जागरूक रहता है, सावधान है और सबके साथ प्रेम का भाव रखता है " ।


 प्रेम खुद के समर्पण का नाम है। आप जितना ज्यादा प्रेम करेंगे, आपका अहंकार उतना ही ज्यादा गिरेगा। प्रेम में कोई बड़ा नहीं बनता। प्रेम में कोई ऊपर नहीं जाता। आप प्रेम में इसलिए झुकते हैं,  क्योंकि आपके अंतर्मन में बसा हुआ प्रेम अहंकार से रहित होता है ।

प्रेम आदमी को आत्मबल, साहस देने के साथ क्षमा करना भी सिखाता है । परम विद्वान, बड़े से बड़े महापुरुष के जीवन का यदि आप अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि उनके जीवन में प्रेम का सर्वश्रेष्ठ स्थान है उन्होंने खुद से प्रेम किया जिसके बल पर उन्होंने जग जीत लिया ।

जिस दिन से आप खुद से प्रेम करने लगते हैं उस दिन से आपके जीवन में संभावनाएं दिखती लगती हैं और आदमी अपने पुरुषार्थ से अपनी तकदीर सवांर लेता है ।

-- वेद प्रकाश तिवारी

Thursday, April 2, 2020

आओ अपने को बंद करें

आओ अपने को बंद करें

----------

एक दूसरे की आलोचना

सारे मतभेद खत्म करें

आओ अपने को घर में बंद करें



अब किसको क्या मिला, नहीं मिला

यह समय नहीं शिकायत का

इस संकट की घड़ी में अपने

मन को रजामंद करें

आओ अपने को घर में बंद करें



बनाकर निश्चित दूरी सबसे

एक्कीस दिन बिताना है

होकर संकल्पित भारत से

कोरोना को भगाना है



इस कठिन परीक्षा में मिलकर

एक दूजे को उत्तीर्ण करें

आओ अपने को घर में बंद करें



जिन्हें नहीं फिकर कोरोना की

करते हैं उल्लंघन नियमों की

कहना है उनसे ,बस भी करो

मर रही मानवता अब तो चेतो



मानव जाति की रक्षा हेतु

बस यही एक संकल्प करें

आओ अपने को घर में बंद



--वेद प्रकाश तिवारी


आओ अपने को बंद करें

आओ अपने को बंद करें

----------

एक दूसरे की आलोचना

सारे मतभेद खत्म करें

आओ अपने को घर में बंद करें



अब किसको क्या मिला, नहीं मिला

यह समय नहीं शिकायत का

इस संकट की घड़ी में अपने

मन को रजामंद करें

आओ अपने को घर में बंद करें



बनाकर निश्चित दूरी सबसे

एक्कीस दिन बिताना है

होकर संकल्पित भारत से

कोरोना को भगाना है



इस कठिन परीक्षा में मिलकर

एक दूजे को उत्तीर्ण करें

आओ अपने को घर में बंद करें



जिन्हें नहीं फिकर कोरोना की

करते हैं उल्लंघन नियमों की

कहना है उनसे ,बस भी करो

मर रही मानवता अब तो चेतो



मानव जाति की रक्षा हेतु

बस यही एक संकल्प करें

आओ अपने को घर में बंद



--वेद प्रकाश तिवारी


अपने को घर में बंद करें
------------------------------
एक दूसरे की आलोचना
सारे मतभेद खत्म करें
आओ अपने को घर में बंद करें

किसको क्या मिला, नहीं मिला
यह समय नहीं शिकायत का
इस संकट की घड़ी में अपने
मन को रजामंद करें
आओ अपने को घर में बंद करें

बनाकर निश्चित दूरी सबसे
एक्कीस दिन बिताना है
होकर संकल्पित भारत से
कोरोना को भगाना है

इस कठिन परीक्षा में मिलकर
एक दूजे को उत्तीर्ण करें
आओ अपने को घर में बंद करें

जिन्हें नहीं फिकर कोरोना की
करते हैं उल्लंघन नियमों की
कहना है उनसे ,बस भी करो
मर रही मानवता अब तो चेतो

मानव जाति की रक्षा हेतु
बस यही एक संकल्प करें
आओ अपने को घर में बंद

--वेद प्रकाश तिवारी

Wednesday, November 13, 2019

सत्ता

सत्ता
---------
मर्यादा ,आदर्श ,कानून ,संविधान की
परिधि के बीचो-बीच
कुछ दरिंदों का शिकार
हो जाती हैं बालाएं
जो चीख- चीख कर
तोड़ देती हैं दम
ऐसे में होता है
समाज आंदोलित
माँगता है न्याय
उसमें कुछ विचारधाराएँ
नहीं देती उनका साथ
उनका बोलना होता है निर्भर
हवाओं के रुख पर
वे निर्माण करती हैं
ऐसा समाज
जो हो मुल्यविहीन
और उन्हें पहुंचा सके
सत्ता के गलियारों तक
इसलिए वे ऐसे कृत्यों पर
कर लेते हैं अपनी
जुबान बंद
भले ही सामाजिक मर्यादा
होती रहे भंग  ।

- वेदप्रकाश तिवारी

Tuesday, November 12, 2019

ये नशा ठीक है
************
ये नशा ठीक है
कि मैं झूमता हूँ
किसी को प्यार देकर
किसी का प्यार पाकर
ये नशा ठीक है
कि लड़खड़ाते हैं मेरे पाँव
जब चलता हूँ उठाकर
किसी लाचार का बोझ
ये नशा ठीक है
कि मेरी आँखें हो जाती हैं लाल
जब झकझोरता है कोई
किसी का आत्मसम्मान
ये नशा ठीक है
कि खौलता है मेरे रगों का खून
जब करता है कोई राष्ट्रद्रोह
ये नशा ठीक है
कि हो जाता हूँ मौन
कि जब बोलता है कोई कटुवचन
अगर डूबा रहा इसी नशे में
तो बचा लूँगा अपने आपको,उस नशे से
जिसमे आदमी डूबकर बनता है अमानुष l

------ वेद