Wednesday, November 13, 2019

सत्ता

सत्ता
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मर्यादा ,आदर्श ,कानून ,संविधान की
परिधि के बीचो-बीच
कुछ दरिंदों का शिकार
हो जाती हैं बालाएं
जो चीख- चीख कर
तोड़ देती हैं दम
ऐसे में होता है
समाज आंदोलित
माँगता है न्याय
उसमें कुछ विचारधाराएँ
नहीं देती उनका साथ
उनका बोलना होता है निर्भर
हवाओं के रुख पर
वे निर्माण करती हैं
ऐसा समाज
जो हो मुल्यविहीन
और उन्हें पहुंचा सके
सत्ता के गलियारों तक
इसलिए वे ऐसे कृत्यों पर
कर लेते हैं अपनी
जुबान बंद
भले ही सामाजिक मर्यादा
होती रहे भंग  ।

- वेदप्रकाश तिवारी

Tuesday, November 12, 2019

ये नशा ठीक है
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ये नशा ठीक है
कि मैं झूमता हूँ
किसी को प्यार देकर
किसी का प्यार पाकर
ये नशा ठीक है
कि लड़खड़ाते हैं मेरे पाँव
जब चलता हूँ उठाकर
किसी लाचार का बोझ
ये नशा ठीक है
कि मेरी आँखें हो जाती हैं लाल
जब झकझोरता है कोई
किसी का आत्मसम्मान
ये नशा ठीक है
कि खौलता है मेरे रगों का खून
जब करता है कोई राष्ट्रद्रोह
ये नशा ठीक है
कि हो जाता हूँ मौन
कि जब बोलता है कोई कटुवचन
अगर डूबा रहा इसी नशे में
तो बचा लूँगा अपने आपको,उस नशे से
जिसमे आदमी डूबकर बनता है अमानुष l

------ वेद

Friday, November 1, 2019

महा पर्व

छठ महापर्व
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ताल, तलैया, नाहर, पोखर
हो गंगा, गंडक या कोशी
सबके तट पर भीड़ है भारी
सूर्य अर्घ्य की है तैयारी
जल में खड़ी सभी मातायें
हाथ अर्घ्य का सूप उठाये
सूरज से ये करें प्रार्थना
स्वीकार करो मेरी आराधना
दो दिन का उपवास ये रखकर
व्रत के नियम का पालन करतीं
दृढ़ संकल्पों की शक्ति से
मन ही मन दिनकर से कहतीं
सब शुभ हो
सब कुछ मंगल हो
अपनी कृपा बनाये रखना
तेरे प्रकाश से हो प्रकाशमान
मेरे अपनो का घर अँगना  ।

 ---वेद प्रकाश तिवारी