Sunday, September 29, 2019

दूसरा वनवास

दूसरा वनवास
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हे राम
मैं एक बार फिर बैठा हूँ
आपकी प्रतीक्षा में
तक रहा हूँ वन की तरफ
कब आएंगे आप ?
अपने पहले वनवास से
जब लौटे थे आप
अपने दिया था मुझे
अपना सर्वोत्तम उपहार
कहा था--
इसे अपने तक मत रखना सीमित
बाँटते रहना औरों के बीच
इससे मानव हो जाएगा विकारों से रहित
पा लेगा अपने होने का अर्थ
पर सदियों बाद आपका उपहार
अब बहुतेरे लेने से
कर रहे हैं इंकार
कुछ कहते हैं--
ये नहीं हैं मेरे जाति और धर्म के
नहीं हैं मेरे विश्वासपात्र
कुछ जपते हैं आपका नाम
पहनकर आपका चोला
पर इनके दुराचार से
पीड़ित है समाज
कुछ सुनकर आपका नाम
रावण की भांति करते हैं अट्ठहास
कहते हैं--
मैंने ही दिया है
राम को दूसरा वनवास
ताकि कायम रहे मेरा साम्राज्य
मैं सुनकर उनकी बातें
हो जाता हूँ दुखी और स्तब्ध
हे राम
एक प्रश्न उठता है
मेरे मन में बार-बार
क्या रावण इतना बुरा था
जितना कि आज का समाज ?
जलता है हर वर्ष रावण
पर क्यों होता है ऐसा प्रतीत
जलाने वाले भी हैं उसी के प्रतीक ?
हे राम
आज नहीं है कोई शबरी
जो खिलाएगी आपको जूठे बेर
नहीं हैं सुग्रीव ,जामवंत और हनुमान
आपके पास
पर कुछ लोगों के हृदय में
सदैव बसते हैं आप
उनमें आदर्श और मर्यादा के रूप में
उपस्थित रहते हैं आप
तभी तो है इंतजार
एक दिन लौटेंगे आप
और मनुष्यता बचाने की हर कोशिश
होगी साकार

-- वेद प्रकाश तिवारी

पहाड़ के सीने पर वार

 पहाड़ के सीने पर वार
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दशरथ मांझी के प्रेम की पराकाष्ठा
बनाती है पहाड़ों में भी रास्ता
वह था बेहद गरीब
बिल्कुल बेसहारा
पर उसके पास थी प्रेम की शक्ति
जिसके आगे हारा
पर्वत सारा
उसने खोया था अपनी पत्नी को
वजह था पहाड़
वह टूट सकता था
बिखर सकता था
जा सकता था छोड़कर गाँव
पर उसके संकल्पों में जिंदा थी फागुनी
जो बनकर उसकी शक्ति
देती थी हिम्मत पहाड़ से टकराने की
22 वर्षों तक वह करता रहा
पहाड़ के सीने पर वार
और चीर कर उसका सीना
बनाई उसमें राह
ताकि भविष्य में जब कोई फागुनी
हो जाए बीमार
तब उसका दशरथ
ना हो विवश और लाचार


---वेद प्रकाश तिवारी