Monday, October 7, 2019

तुलसीदास

तुलसीदास
~~~~~~
बनारस के अस्सी घाट पर 
बैठे हैं उदास
गोस्वामी तुलसीदास
देखते रहते हैं चुपचाप
गंगा में डुबकी लगाने वालों की भीड़ को
उस भीड़ में कुछ ऐसे भी हैं शामिल
जो स्नान के बाद 
लगाकर माथे पर तिलक
करते हैं मानस की बातें 
लोगों को बताते हैं
अपना आचरण और संस्कार
ताकि चलता रहे
उनके सियासत का बाजार
ऐसे हालात में तुलसीदास
बंद कर लेते हैं अपनी आँखें
और कहते हैं श्रीराम से--
मैंने जो कुछ भी लिखा, भक्ति -भाव से लिखा
जो कल्याणकारी है मानव मात्र के लिए
पर अब जाति, धर्म और लिंग का
पहनकर चश्मा
कुछ लोग पढ़ रहे हैं मानस
और बाँट रहे हैं आपको
अब मैं कोई कथा न लिख सकूँगा
सुनकर तुलसीदास की बातें
कहते हैं श्रीराम मुस्कुराकर--
तुम्हारे मानस के सहारे ही
मिलती है ऊर्जा
साधु पुरुषों को
परिस्थितियां जैसी भी हो
तुम लिखते रहना मेरे संदेशों को
ताकि बची रहे मनुष्यता
जब असह्य हो जाए जीना
तब आ जाना मेरे पास
मैं जब भी आऊँगा धरती पर
तुम्हें भी लाऊँगा अपने साथ  । 

--- वेद प्रकाश तिवारी

Saturday, October 5, 2019

अपमान

अपमान
-----------
मनुष्य बनने की कोशिशों के बीच
मुझे पीना पड़ता है अक्सर
अपमान का विष
क्यों कि, 
नहीं बन सकता मैं
किसी के जैसा
नहीं कर सकता समझौता
उन चीजों से
जो करता हो आहत
जीवन मूल्यों को
इसलिए बहुतों की उम्मीदों पर
खरा नहीं उतर सका मैं
उनकी दौड़ में
पीछे छूट गया मैं
फिर भी अकेला नहीं हूँ मैं
मेरे पास हैं
मेरे पुरखों की कुछ किताबें
जब भी मैं होता हूँ उदास
वो मुझे देती हैं ऊर्जा
कहती हैं मुझसे --
अपमान से न होना कभी निराश
असीम संभावनाएं 
मनुष्य बनने की
हैं तुम्हारे पास  । 

Thursday, October 3, 2019

कलमकार

कलमकार
*********
मुझे कलमकार तक ही सीमित रहने दो
और जीवित रहने दो उनके बीच
जिनकी पीड़ा रहती है शामिल
मेरी रचनाओं में । 
मेरी रचनायें गहरी पीड़ा से गुजरकर ही
बंधती हैं छन्दों में
और कहतीं हैं मुझसे--
विषम परिस्थितियों में भी
मत छोड़ना उनका साथ
कभी जो रह गए हैं यात्रा में
सबसे पीछे ।
तभी मैं रह पाऊँगी
निष्पक्ष, मौलिक और प्रासंगिक
इसलिए मुझमें कुछ और मत तलाशो
मैं नहीं हो सकता कभी
अपनी रचनाओं से बड़ा
मुझे यथार्थ की परम्परा का निर्वहन करने दो
मैं कलमकार हूँ
कलमकार ही रहने दो  ।


  -- वेद प्रकाश तिवारी