सत्ता
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मर्यादा ,आदर्श ,कानून ,संविधान की
परिधि के बीचो-बीच
कुछ दरिंदों का शिकार
हो जाती हैं बालाएं
जो चीख- चीख कर
तोड़ देती हैं दम
ऐसे में होता है
समाज आंदोलित
माँगता है न्याय
उसमें कुछ विचारधाराएँ
नहीं देती उनका साथ
उनका बोलना होता है निर्भर
हवाओं के रुख पर
वे निर्माण करती हैं
ऐसा समाज
जो हो मुल्यविहीन
और उन्हें पहुंचा सके
सत्ता के गलियारों तक
इसलिए वे ऐसे कृत्यों पर
कर लेते हैं अपनी
जुबान बंद
भले ही सामाजिक मर्यादा
होती रहे भंग ।
- वेदप्रकाश तिवारी
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मर्यादा ,आदर्श ,कानून ,संविधान की
परिधि के बीचो-बीच
कुछ दरिंदों का शिकार
हो जाती हैं बालाएं
जो चीख- चीख कर
तोड़ देती हैं दम
ऐसे में होता है
समाज आंदोलित
माँगता है न्याय
उसमें कुछ विचारधाराएँ
नहीं देती उनका साथ
उनका बोलना होता है निर्भर
हवाओं के रुख पर
वे निर्माण करती हैं
ऐसा समाज
जो हो मुल्यविहीन
और उन्हें पहुंचा सके
सत्ता के गलियारों तक
इसलिए वे ऐसे कृत्यों पर
कर लेते हैं अपनी
जुबान बंद
भले ही सामाजिक मर्यादा
होती रहे भंग ।
- वेदप्रकाश तिवारी
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